मदहोशी में डूबा रहता था कभी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क


आती नहीं अब

फिजां में वैसी बहार


होती थी खुशियों की बारिस

उड़ रहे अब धूल

अमराईयों में पहले था जैसा

खिलते नहीं अब,वैसे फूल

मदहोशी में डूबा रहता था कभी

नहीं वैसा अब खुमार


परिभाषा प्रेम की

परिलक्षित होती थी यहां

बिसूर गए वो दिन

जाने गया कहां

विष बेल बो दिया

फिर पनपे कैसे प्यार


हुए विस्मृत अब

लगता था,जैसे इक ख्वाब

क्या हाल है,कैसे हैं

मिला करिए जनाब

आपस के भाईचारे में

कैसे पड़ गयी दरार


आती नहीं अब

फ़िजा में वैसी बहार


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राजेंद्र कुमार सिंह

ईमेल: rajendrakumarsingh4@gmail.com