अस्ताचल सूर्य को व्रती महिलाओं ने दिया अर्घ

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

गंभीरपुर /आजमगढ़। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक डाला छठ का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जा रहा है व्रती महिलाएं नहाए खाए से शुरू हुए इस व्रत में बुधवार की शाम पहला अर्घ ली। लगभग 3:00 बजे से घाटों पर महिलाओं का आना शुरू हो गया घाट पर आने के उपरांत व्रती महिलाएं पानी में सुपेली,नारियल चुनरी लेकर खड़ी रही सूर्य डूबने पर परिवार जनों का अर्घ ली गंभीरपुर कोनौली बाबा विश्वनाथ दास मंदिर जलाशय,शिव मंदिर जलाशय,राम जानकी मंदिर बिंद्रा बाजार,, विसया समेत अनेक  क्षेत्रों में महिलाओं ने व्रत रखकर बड़े धूमधाम से सूर्य देव की उपासना की। सुरक्षा की दृष्टि से सभी घाटों पर पुलिस लगी रही। पंडित पद्माकर मिश्रा ने बताया कि पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहते हैं राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा।राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है। इस कथा के अलावा एक कथा राम-सीता जी से भी जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया । मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। जिसे सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।