खुश हो जय जय बोलो

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  


साथियों,

वर्तमान हालात को बयां करती हम लोगों के बड़े भाई, लोकतन्त्र सेनानी, वरिष्ठ पत्रकार, जनकवि धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव की नई रचना,

" खुश हो जय जय बोलो " 

पढ़े और पढ़ाएं- अनिल कुमार त्रिपाठी, अध्यक्ष, लोकनायक जयप्रकाश नारायण ट्रस्ट, लखनऊ।

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अन्नदाता पर जीप चढ़ा दी,

खुश हो जय जय बोलो।

कोटि कोटि की नींद उड़ा दी,

खुश हो जय जय बोलो।


शतकवीर पेट्रोल हो गया,

डीजल भी होने को,

सरसो ने दो शतक बना दी,

खुश हो जय जय बोलो।


खाली लिए सिलेंडर धनिया,

गैस गैस चिल्लाकर,

फिर लकड़ी पर दाल चढ़ा दी,

खुश हो जय जय बोलो।


दो का चार, चार का सोलह,

कर लो मंहगाई में,

अपनों खातिर राह बना दी,

खुश हो जय जय बोलो।


होटल में मनीष की सेवा,

खेतों में बिटिया की,

मैंने मन की बात सुना दी,

खुश हो जय जय बोलो।


मांगी माफी पूछ " पिता " से,

वध साजिश कर्ता ने,

हवा हवाई बात छपा दी, 

खुश हो जय जय बोलो।


जो लाए हैं हमें यहाँ तक,

उन यारों के कर में,

जन की पूंजी भेंट चढ़ा दी,

खुश हो जय जय बोलो।


वह कन्धार तलक पहुंचाए,

अज़हर को उड़वा कर,

मैंने पूरी टीम हरा दी,

खुश हो जय जय बोलो।


कसम वर्ष पचहत्तर की इस,

लोकतन्त्र वध खातिर,

चुनकर हर आवाज दबा दी, 

खुश हो जय जय बोलो।


तुम्हें युद्ध का पाठ पढ़ाकर,

दुश्मन के आंगन में,

मीत ने चीनी मिल लगा दी,

खुश हो जय जय बोलो।


जिसने कहा मिरे सिरहाने,

सब आहिस्ता बोलें,

उसके बगल में रेल चला दी,

खुश हो जय जय बोलो।


सेवा कहकर बापू, जेपी,

जिसको इतराते थे,

उसी नीति की रेंड़ बजा दी, 

खुश हो जय जय बोलो।


- धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव, सम्पादक, 

राष्ट्रपुरुष चन्द्रशेखर  - सन्सद में दो टूक

लोकबन्धु राजनारायण - विचार पथ एक, 

अभी उम्मीद ज़िन्दा है