कोन थी वो

जो दिल चुराना जानती थी

आते जाते कनखियो देखना चाहती थी वो


बे मकसद मेर घर आया जाया

करती थी वो


कभी चांद कभी तारे कभी सूरज

को भी डराती थी वो


कभी सांझ पडे  पायल की खनक

करती थी वो


जब साझ पडे उसके दवारे से

गुजरता था मै


कोन थी वो जो मेरे चोट पर चुपके से आंसु बहाती थी वो


अनकही अनजानी कहानी थी वो

एक हवा के झोके से आई वो


फिर न जाने कुछ कभी कह पाई वो


एक प्रेम चक्षुओ मे भर कर कयी

बार आई पर कह नही पाई वो


दोनो अनजान बने रहे ,अब न

जाने कहां खो गयी वो


अर्चना आरची