मानवता ही श्रेष्ठ धर्म मनुष्य को करना होगा इसका पालन : लक्ष्मी सिन्हा

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

धर्म शास्त्रों में मानव जन्म सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। इसका कारण है कि मनुष्य के पास विचार शक्ति है। इसके सदुपयोग से मनुष्य श्रेष्ठ बन सकता है तो दुरुपयोग से अधम भी हो जाता है। इसी दुरुपयोग से बचने एवं सन्मार्ग की राह पर चलने के लिए शास्त्रों में अनेक उपाय बताए गए हैं। उन निषेधो का भी उल्लेख किया गया है, जो मनुष्य के लिए घातक है। जीवन में कोई अप्रिय स्थिति आती है तो प्राय: राम रामचरितमानस का दोहा सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ, हानी लाभु जीवन मरनु जासु अपजसु विधि हांथ उदृत करते हुए विधाता को जिम्मेदार चेहरा दिया जाता है। यह विधि का अर्थ विधाता कहकर भगवान को जिम्मेदार घर आने की जगह विधिक जीवन पद्धति से लिया जाना चाहिए। केवल मनुष्य का ही नहीं प्रकृति आर जड़ पदार्थों तक का अपना विधिक नियम है। पेड़ पौधे अपने नियत समय पर फल फूल देते हैं। इसी तरह धरती पर सभी देशों की अपनी विधि व्यवस्था है। घर परिवार की भी विधि व्यवस्था होती है। यहां तक कि मनुष्य अपना जीवन जीने के लिए विधि व्यवस्था का पालन करता है। जब सब विधान मनुष्य खुद कर रहा है तो जिम्मेवार भगवान कहां से हो जाएगा? मनुष्य खुद देखें कि जो भी लोग लाभ में हैं बे कैसे लाभ में हैं और जिन्हें हानि हुई, वह क्यों हुई? व्यक्ति सकारात्मक जीवन और परिश्रम करता है तो उसे लाभ मिलता है और नकारात्मक तरीके से लाभ चाहता है तो उसे हानि की पूरी संभावना रहती है। लाभ हानि का मूल्यांकन केवल भौतिक धारातल पर नहीं करना चाहिए। सुख शांति नहीं है जीवन में तो यह भी हानि ही है। इसी तरह जीवन मरण तथा यस अपयस के लिए विधाता कहीं से जिम्मेवार नहीं होते। विधि व्यवस्था के पक्षधर पंड़वो और अ विधि के पक्षधर कौरवों के बीच युद्ध हो रहा है। मनुष्य को भी खुद विवेक को सारथि बनकर विधिक नियमों के रथ पर सवार होना चाहिए। उसे लोग की अपने भाग्य का भगवान वह स्वयं ही हैं। 

लक्ष्मी सिन्हा प्रदेश संगठन सचिव महिला प्रकोष्ठ राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी रालोजपा बिहार पटना सिटी