पिसता बचपन

                                                
युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


बहुत बढ़ गया बोझ कंधों पर, कैसे उसे संभालेंगे,  

नन्हे कोमल फूल हैं ये, देखना मुरझा तो नहीं जाएंगे,  

देख टीवी चैनल पर करतब उनके, सांसे थम जाती हैं,   

कितना पसीना बहाया होगा, सोच जान कांप जाती है,  

कुछ को मिलता इनाम, कुछ आँसू बहा कर जाते हैं,  

मनोदशा उनकी कैसी होगी, सोच आँसू निकल आते हैं,  

कहीं स्वार्थ कहीं महत्वाकांक्षा का दायरा बढ़ रहा है,  

इन दो पाटों की चक्की में, बचपन पिसता जा रहा है,  

नहीं मिला वक्त उन्हें बचपन, बचपन जैसे जी पाने का,  

कभी तनाव पढ़ाई का, कभी हर क्षेत्र में प्रथम आने का, 

माता-पिता की हसरतों के आगे, क्या बचपन का मोल नहीं,  

किंतु बचपन जैसा जीवन में, दूसरा पल कोई और नहीं,  

इतना सब कुछ करके भी, कहाँ सभी सितारे बन पाते हैं,  

कुछ को मिलता नाम मगर, कुछ गुमनामी में खो जाते हैं।  


-रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)