जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 के दुष्प्रभाव के चलते मानवीय जीवनशैली और सोच के हर पहलू का पुनर्मूल्यांकन कर जीवन को उस अनुरूप ढालना ज़रूरी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

प्राकृतिक आपदाओं और मानव निर्मित विपदाओं से निपटने दुनियां को मानवता के लिए बेहतर जगह बनाने नए सबक और सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत - एड किशन भावनानी

गोंदिया - वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर सभी देश दो समस्याओं से जूझ रहे हैं पहला - तथा कथित मानव निर्मित कोविड-19 और वर्तमान उससे जुड़े नए नए वेरिएंट सहित ज़ीका। दूसरा जलवायु परिवर्तन के चलते प्राकृतिक आपदाएं। साथियों बात अगर हम इन दोनों गंभीर समस्याओं की करें तो यह पृथ्वी पर वर्तमान मानव योनि के लिए और भविष्य की हमारी पीढ़ियों के लिए ख़तरनाक सिद्ध होंगी। हालांकि इन दोनों समस्याओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंच अपने अपने स्तर पर सक्रिय हैं और सदस्य देशों को दिशानिर्देश दे रहे हैं। पहली समस्या के लिए डब्लयूएचओ और दूसरी समस्या केलिए पेरिस जलवायु समझौता।

 इनमें संयुक्त राष्ट्रसंघ भी सक्रियता से अपनी भूमिका निभा रहा है। अभी हाल ही में स्कॉटलैंड में हुए ग्लास्गो कॉप-26 में ज़लवायु परिवर्तन पर गहन मंथन हुआ। साथियों बात अगर हम इन दोनों समस्याओं पर अपने व्यक्तिगत जीवन की करें तो, हमें इन दोनों समस्याओं जलवायु परिवर्तन और कोविड-19 के दुष्प्रभाव के चलते हमें अपनीं जीवनशैली और सोचके हर पहलू का पुनर्मूल्यांकन करने और जीवनको उस अनुरूप ढालनां ज़रूरी है क्योंकि हम देख रहे हैं करीब दो साल से हम कोविड-19 से जूझ रहे हैं। ऊपर से इन प्राकृतिक विपदाओं द्वारा आग में घी डालने का काम हो रहा है। हालांकि दोनों समस्याएं ऐसी है कि मानव अपने ज़ज़बे और जांबाज़ी को कायम रखते हुए इनसे मुकाबला करना है, परंतु हमें कुछ अपने स्वयं के तरफ, अपनी जीवनशैली की तरफ भी देखना होगा कि हम किस तरह इन दोनों समस्याओं को मानव योनि पर भारी होने से रोकें। 

साथियों बात अगर हम अपने जीवनशैली और सोच को बदलने की करें तो हमें कोविड-19 नियमों दो गज की दूरी मास्क हैं ज़रूरी तथा पर्यावरण से मानवीय छेड़छाड़ को बंद कर पर्यावरण सुरक्षित रखने, पराली जलाना, धुआं करना, झाड़ काटना इत्यादि सभी अपने अवैध कार्यकलाप बंद करने होंगे। जैविक विविधता को सुरक्षित रखने की और कदम उठाना होगा। आज अगर हमें कोविड नियमों में ढील मिली है तो हमने मास्क लगाना और नियमों का पालन करना अधिकतम हद तक छोड़ दिया है। जिस तरह हम अपने आसपास और टीवी चैनलों पर ग्राउंड रिपोर्टिंग देख रहे हैं इनमें तो यही लग रहा है। 

साथियों जीवन सुरक्षित करने के लिए हमें अपनी जीवनशैली और सोच को तात्कालिक प्रभाव से परिवर्तित करना ही होगा और ज़लवायु परिवर्तन उच्च कार्बन स्तर नियंत्रण करना ही होगा। साथियों बात अगर हम 8 नवंबर 2021 को ग्लास्गो कॉप-26 देशों के पांच देशों के सामूहिक बयान की करें तो पीआईबी के अनुसार, सामूहिक बयान प्रस्तुत करते हुए प्रमुख वार्ताकार (भारत) तथा पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव ने कहा कि बेसिक देश सस्ते उपायों पर अनुचित रूप से निर्भर हुए बिना अपने उच्चकार्बन स्तर एवं अस्थिर जीवन शैली को बनाए रखते हुए विकसित देशों द्वारा अपनाए गए शमन के ठोस एवं विश्वसनीय घरेलू कदमों का समर्थन करते हैं और इस उद्देश्य के लिए, बेसिक देशों का समूह उन बाजारों का समर्थन करता है, जोकि विश्वसनीय हैं और उच्च पर्यावरणीय निष्ठा एवं गैर-बाजार आधारित ठोस दृष्टिकोण से लैस भी हैं।

 साथियों बात अगर हम माननीय उपराष्ट्रपति द्वारा दिनांक 7 नवंबर 2021 को एक समारोह में उनके संबोधन की करें तो पीआईबी के अनुसार उन्होंने, जलवायु परिवर्तन के भयंकर परिणामों के बारे में चेताते हुए उन्होंने प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर जीने पर जोर दिया। अपनी जड़ों की ओर लौटने पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपने पूर्वजों की उस पारंपरिक जीवनशैली को पुन अपनाना चाहिए जिसमें वे अपने पर्यावरण और प्रकृति के साथ मैत्रीवत जीवन जीते थे। 

उन्होंने आशा व्यक्त की कि यह सम्मेलन कोविड के बाद की दुनिया को मानवता के लिए एक बेहतर जगह बनाने के लिए नए सबक और सूक्ष्म दृष्टि प्रदान करेगा - एक ऐसी दुनिया जहां प्रतिस्पर्धा करुणा को रास्ता देती है, धन स्वास्थ्य के लिए रास्ता बनाता है, उपभोक्तावाद आध्यात्मिकता और सर्वोच्चता का मार्ग प्रशस्त करता है और प्रभुत्व की भावना शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की राह तैयार करती है। दुनिया में शांति और सद्भावना की स्थापना के लिए उन्होंने कोविड-19 महामारी के मद्देनजर हमारी जीवन शैली और सोच के हर पहलू का पुनर्मूल्यांकन करने का आह्वान किया। उन्होंने यह भी कहा कि हमें लोगों के जीवन में तनाव घटाने और उन्हें सुखी और प्रसन्न बनाने का मार्ग खोजना होगा। 

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि जलवायु परिवर्तन और कोविड -19 के दुष्प्रभाव के चलते मानवीय जीवनशैली और सोच के हर पहलू का पुनर्मूल्यांकन कर जीवन को उस अनुरूप ढालना ज़रूरी है तथा प्राकृतिक आपदाओं और मानव निर्मित विपदाओं से निपटने दुनिया को मानवता के लिए बेहतर जगह बनाने नए सबक और सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। 


-संकलनकर्ता लेखक- कर विशेषज्ञ एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र