नवरात्रि का असली महत्त्व एवम सार्थकता

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

सर्वप्रथम, आप सभी को शारदीय नवरात्रि की हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएं प्रेषित करती हूं एवं आप सभी के जीवन में सभी कुछ मंगलमय हो इसकी परमपिता परमात्मा से अनुकंपा, कामना,प्रार्थना करती हूं। दोस्तों, जैसा कि आप और हम सभी जानते हैं कि नवरात्र वर्ष में दो बार आते हैं। नवरात्रों में सभी भक्तजन तामसिक भोजन एवं  तामसिक प्रवृत्तियों से दूर रहने की कोशिश करते हैं क्योंकि उनके अनुसार नवरात्रि के 9 दिनों में ऐसा कोई भी कार्य ,ऐसा कोई भी खाद्य पदार्थ नहीं लेना चाहिए जिससे नवरात्रि की आराधना में दोष लगे और नवरात्रि पूजा से मिलने वाले पुण्य से वंचित रहना पड़े ।

अक्सर लोग नवरात्रि में नए सामान खरीदते हैं, नया मकान खरीदते हैं एवं कोई भी शुभ कार्य करने का इंतजार भी नवरात्रों में ही खत्म होता है ।कहने का तात्पर्य यह है कि नवरात्रि में सभी प्रकार के शुभ कार्य करने का विधान माना गया है। नवरात्रि से पहले श्राद्ध के दौरान भक्तजन ना तो कोई नया सामान खरीदते हैं और ना ही कोई शुभ कार्य करने में विश्वास रखते हैं ।उनके अनुसार श्राद्ध के समय में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए किसी भी नए और शुभ कार्य के लिए सभी भक्तजन अक्सर नवरात्रि का इंतजार करते हैं। 

यह तो बात रही सामान खरीदने या कोई शुभ कार्य करने की ।अक्सर लोगों के मन में कन्याओं एवं महिलाओं के प्रति सम्मान ,स्नेह और सहानुभूति का एहसास भी नवरात्रि के दौरान ज्यादा प्रबल हो जाता है ।वर्ष भर वे चाहे किसी कन्या अथवा घर की बहू बेटियों के साथ अदब से पेश न आते हों,परंतु नवरात्रि के दौरान,जी हां, इन 9 दिनों में उनके अंदर अजीब सा बदलाव आने लगता है,कन्याओं की पूजा की जाती है ,उनके चरण स्पर्श किए जाते हैं एवं उनसे आशीर्वाद भी लिए जाते हैं। वर्षभर तिरस्कार प्राप्त करने वाली आदिशक्ति को केवल 9 दिनों में देवी समझकर पूजा जाता है ताकि नवरात्रि का पूरा फल मिल सके।

 यह बात हम सभी जानते हैं कि नारी के अनेक रूप होते हैं अर्थात नारी देवी तुल्य है और देवी के अनेक रूपों की आराधना पूजा हम सभी करते हैं। देवी के विभिन्न रूपों से तात्पर्य देवी के व्यवहारों से है, अर्थात भिन्न-भिन्न अवसरों पर अलग-अलग माहौल एवं परिस्थितियों में नारी किस प्रकार अपना स्वरूप बदल कर प्रतिक्रिया देती है उस आधार पर नारी के रूपों का बखान शास्त्रों में भी किया गया है। कहीं नारी को मां सरस्वती की संज्ञा दी गई है ,वहीं दूसरी ओर रौद्र रूप में आने पर नारी को काली भी कहा जाता है। देवी समझ कर नारी की आराधना अर्चना करने का पुण्य पाने के लिए भक्तजन नवरात्रि के सभी व्रत करते हैं एवं देवी को प्रसन्न करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ते ।

दोस्तों मेरे इस लेख को लिखने का उद्देश्य आप सभी को नवरात्रि में होने वाली पूजा, आराधना और नवरात्रि मनाए जाने के कारणों से अवगत कराना नहीं है ।यह तो हम सभी जानते हैं कि नवरात्र क्यों ,कब और कैसे बनाए जाते हैं। नवरात्रि के दौरान क्या-क्या करना चाहिए, क्या क्या नहीं करना चाहिए और नवरात्रि का असली महत्व क्या है,हम सभी जानते हैं।इसलिए इन बातों पर चर्चा न करते हुए मैं आपसे इस आलेख के मुख्य उद्देश्य पर बात करना चाहती हूं एवं अपने विचार रख आप सभी के विचारों से भी अवगत होने का छोटा सा प्रयास करना चाहती हूं ।

आखिर क्यों वर्ष भर अपमान सहने वाली नारी जाति को नवरात्रि के 9 दिनों, सिर्फ 9 दिन ही क्यों पूजा जाता है ,क्यों वर्ष भर उसके साथ वही व्यवहार नहीं किया जाता जो नवरात्रि के दौरान किया जाता है ।क्या नवरात्रि के दौरान नारी नारी नहीं रहती अथवा उसमें ऐसी अद्भुत शक्तियां आ जाती है अथवा ऐसे चमत्कारी परिवर्तन आ जाते हैं जो वह एक सामान्य नारी से देवी का रूप धारण कर लेती है और सभी उसकी आराधना पूजा करना प्रारंभ कर देते हैं। क्या आपको यह बात हजम होती है ?क्या आपको यह बात तक संगत लगती है? क्या आप इस बात से सरोकार रखते हैं कि वर्ष भर में केवल नवरात्रि के दौरान ही हमें अपनी बहू ,बहन ,बेटी और मां का सम्मान करना चाहिए चाहे वर्ष के बाकी दिनों में उन्हें उनका हक ,अधिकार और मान सम्मान मिले अथवा ना मिले।

साथियों,अपनी मां को हम साल के 365 दिन मां कहकर ही पुकारते हैं,एक पति अपनी पत्नी को वर्ष भर पत्नी मान कर ही उसका साथ निभाता है और अपनी बेटी की सभी इच्छाएं किसी विशेष दिन देख कर नहीं,अपितु वर्ष भर पूरी करने का अथक प्रयास करता है ।वह अपनी बहन की रक्षा करने के लिए किसी खास दिन या परेशानी विशेष का इंतजार नहीं करता अपितु, हर मुश्किल घड़ी में उसका साथ देने के लिए खड़ा रहता है।इसी प्रकार एक बहन, भगिनी, मां और बेटी भी पूरा वर्ष अपने-अपने दायित्व को निभाने में कभी पीछे नहीं हटती।जब स्त्री और पुरुष एक दूसरे को वर्ष भर पूरे मन के साथ सहयोग करते हैं तो ऐसे में किसी एक दिवस या कुछ दिनों को विशेष समझकर नारी की पूजा करना स्तुति करना कहां तक तर्कसंगत है ।नारी तो हर पल, हर क्षण पूजनीय है ।नारी की पूजा करने का अर्थ उसे मंदिर में सजाकर उसकी आराधना करना नहीं है ,अपितु उसको सदैव मान सम्मान देना एवं उसकी भावनाओं की कद्र करना ही उसकी असली पूजा करना है। नवरात्रि का असली महत्व तभी है,सार्थकता तभी है,तब जबकि नारी को हर हाल ,हर परिस्थिति और हर पल देवी समझ उसके साथ उचित व्यवहार किया जाए, उसकी भावनाओं की कद्र की जाए एवं उसको पूरा मान-सम्मान एवं अधिकार दिया जाए।


पिंकी सिंघल

अध्यापिका

शालीमार बाग

दिल्ली