महिलाएं क्यों खेलती है सिंदूर खेला, जानिए दुर्गा विसर्जन की खास परंपराएं

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

नवरात्रि का पावन त्योहार पूरे नौ दिनों तक मनाया जाता है। इस दौरान लोग देवी दुर्गा के नवरूपों की पूजा करते हैं। वहीं खासतौर कोलकत्ता में दुर्गा पूजा का महाउत्सव मनाया जाता है। इन शुभ दिनों में लोग घरों या पंडालों में देवी दुर्गा की मूर्ति स्थापना करते हैं। पूरे नौ दिनों तक विधि-विधान से देवी मां की पूजा की जाती है। 10 वें यानि दशहरे वाले दिन बड़ी धूमधाम से देवी मां की मूर्ति का विसर्जन करने की प्रथा है। इस साल यह पर्व 15 अक्तूबर दिन शुक्रवार को पड़ रहा है। चलिए आज हम आपको इस खास मौके पर दुर्गा विसर्जन से जुड़ी परंपरा व खास बातें बताते हैं...

सदियों पुरानी परंपरा

इस पर्व को मनाने के पीछे सदियों पुरानी परंपरा जुड़ी है। कहा जाता है कि जिस तरह बेटियां अपने ससुराल से मायके आकर रहती है। फिर कुछ दिनों के बाद अपने घर यानि ससुराल वापिस लौट चली जाती है। ठीक उसी तरह देवी दुर्गा अपने मायके यानि धरती पर आकर रहती हैं। अपने भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। फिर 9 दिन बीताने के बाद दशमी तिथि पर अपने घर यानि भगवान शिव के पास मां पार्वती के रूप में कैलाश पर्वत पर वापिस चली जाती हैं। लोग जिस तरह बेटियों को उनके ससुराल जाने पर खाने-पाने, कपड़े आदि सामान भेंट देते हैं। ठीक उसी तरह लोग दुर्गा मां के विसर्जन से पहले उनके पास एक पोटली भरकर बांध देते हैं। इस पोटली में मां के श्रृंगार का सामान, भोग आदि रखा जाता हैं। ताकि उन्हें देवलोक जाते समय रास्ते में कोई परेशानी का सामना ना करना पड़े।

महिलाएं मनाती सिंदूर खेला का उत्सव

बंगाली समुदाय की महिलाएं इस खास पर्व पर दुर्गा विसर्जन से पहले सिंदूर से होती खेलती है। इसे सिंदूर खेला कहा जाता है। कहा जाता है कि सिंदूर खेला का उत्सव आज से करीब 450 साल पहले से मनाया जा रहा है। इस दिन महिलाएं पान के पत्तों पर सिंदूर रखकर उसे मां दुर्गा के गालों को स्पर्श करती है। फिर उससे उनकी मांग और माथे पर सिंदूर लगाती है। मान्यता है कि इस पर्व को मनाने से देवी मां की असीम कृपा से सुहाग की लंबी उम्र होती है। इसके दिन दुर्गा मां को पान और कई अलग-अलग मिठाइयों का भोग भी लगाने की परंपरा है। इसे विवाहित महिलाओं द्वारा खेला जाता है। इस दौरान महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर बधाई देती है। देवी मां के अखंड सौभाग्य की कामना करती है। इस शुभ मौके पर देशभर के कई जगहों पर नाच-गाने के खास आयोजन होते हैं।

विसर्जन के बाद मनाया जाता विजय दशमी का पर्व

इस दौरान लोग देवी मां का व्रत रखते हैं। लोग विसर्जन के बाद व्रत को खोलते हैं। इस दिन दुर्गा विसर्जन के बाद दशहरे का पावन त्योहार भी धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि आज ही के दिन प्रभु श्रीराम ने राक्षस राज रावण का वध करके तीनों लोगों को उससे आजाद करवाया था। इसके साथ ही देवी दुर्गा ने असुर महिषासुर को मारा था। इसलिए दशमी तिथि को विजय दशमी भी कहा जाता है। इस दिन शमी के पेड़ की पूजा करने का भी खास महत्व है। रावन दहन से बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है।