कैसी अजीब प्यास थी,,,,,,

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


अब के बहार आयी तो 

यूँ ही निकल गई,

हर घड़ी ख़्वाब की ,

इंतेज़ार में गुज़र गई,

सफ़र  सफ़र ही रहा मैं

भी मंज़िलों से दूर,

संग ए गिरा थे ख़्वाब 

तिशनगी मेंगुज़र हुई,

चांद भी रफ़्ता रफ़्ता हुआ

मद्धम सा,अब,

जुस्तजू थी फूलों की 

काँटों से उलझ गई,

उम्रे रवां थी  रुकती भी 

किस तरह बोलो,

होंठ हुए गुलाब, आंखें 

तीरों में बदल गई,

कैसी अजीब प्यास थी  

बेक़रारी लिये हुये,

फूलों से जले हाथ, 

मंज़िलें ही बदल गई,

दर्द की रहगुज़र ,जिंदगी

हक़ीकत ही नहीं,

रफ़्ता रफ़्ता मुश्ताक़,

मौत से मिल गई,


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

सहज़  हरदा मध्यप्रदेश,,,