सब निर्यात हो जाता

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

रुक्मणि--आंचल अरी ओ आंचल, सुन री इधर तो आ बेटी, पलंग पे लकवा से ग्रसित हो चुकी रुक्मणि अपनी बेटी आंचल को आवाज़ दे बड़े प्यार से बुलाई। हां मां बोलिए बेटी हो आई बाजार से। 

आंचल--हां मां आ गई।

रुक्मणि-- बेटी क्या तू संतरे लेकर आई। डा. भी कम्बख्त बोला जितना फल, जूस, सलाद ताकत की चीजें खाओगी जल्दी ठीक हो जाओगी। शरीर को भी ताकत मिलेगी। 

आंचल-- कहां मां कहां ले सकी मैं संतरे, सेब आदि फल।

रुक्मणि-- क्यों बेटी! क्या हुआ?

आंचल-- मां क्या बताऊं एक तो हमारी आर्थिक हालत ठीक ठाक ऊपर से हमारे देश में ही अधिक मात्रा में होने वाली संतरों की पैदावार को ही विदेशों में निर्यात कर दिया जाता है। बाजार मे सिर्फ संतरे ही सौ रुपए के बस छ: थे। मां आप ही बताओ मैं सौ रुपए में तीन तरह के सामान खरीद लाती या सिर्फ संतरे?

रुक्मणि-- बेटा क्या करें ये निर्यात करने वाले अधिक आर्थिक लालच के चक्कर में हमारे ही देश के नागरिकों को अपने ही देश के पैदावार के हक से वंचित कर जाते हैं।

आंचल-- हां मां आप सही कह रही हैं। अच्छी कमाई के चक्कर में देश के नागरिकों को बची खुची पैदावार में से ही खरीदना ही पड़ता है जिसके कारण वो आम जनता की मजबूरी का फायदा उठाते हैं। मां सिर्फ यहां संतरे ही नहीं अपितु हर एक स्वदेशी चीजों को विदेशों में बेच कर चार गुना से अधिक मुनाफ़ा कमा रहे लोग। तभी तो आज देश में दिन प्रतिदिन लालच के चलते यहां भी दुगने दामों में बेच सामान आम जनता के बजट से ही छीन रहे। मां कर भी क्या सकते दुख: होता आज सोच कर की अपने देश की जनता को दुखी कर विदेशियों को खुश करना। कहां तक उचित है।

रुक्मणि-- जानो दो बेटा कोई बात नहीं मेरी बच्ची तुम बहुत मेहनत कर एक-एक पैसा मेहनत से कमा मेरे लिए दवा ला देती हो। पहले ही मेरी बच्ची तुम्हारे कांधों पर बोझ बन रह गई हूं मैं।

आंचल-- नहीं मां! कैसी बात कर रही हो। आपने मुझे जन्म दिया है। आपने मेरी हर एक बात को मान मुझे बड़ा किया, सुख दिया। मां आज फिर तुम बोझ कैसे हुई मेरी मां हो आप आगे से कभी एसा न कहना मां। कल मैं काम से आते हुए फल बाजार से पूछते आऊंगी अगर कहीं ससते मिले तो मां मैं ले आऊंगी। आप चिंता न करो मैं हूं ना मां।

रुक्मणि-- मेरी प्यारी बेटी सदा खुश रहे तेरी जैसी बेटियां सबको मिले।

आंचल-- ये क्या मां फिर आप रो पड़ी सब ठीक हो जाएगा आप जल्दी ठीक हो जाओगी।

रुक्मणी-- बेटी ये तुझे देख मेरी ममता और खुशी के आंसू हैं।

रुक्मणि ने इतना कह लेटे-लेटे आंचल को गले लगा लिया।

वीना आडवानी तन्वी

नागपुर, महाराष्ट्र