सम्मान का ध्वज

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क


सर पर ईंट ढ़ोती हुई महिलायें नन्हें हाथों से

चाय बेचता हुआ लड़का। बाल्टी के उसी पानी

में बार-बार कपड़ा डूबो निचोड़ कर फर्श पर पोछा

फेरती हुई काम वालियां। पटाखे बनाते हुए छोटे बड़े

हाथ। दिवार को रंगीन बनाते हुए कम उम्र संग उम्रदराज 

पुतइयै। 


सड़क की सफाई हो या हो वाशरूम साफ करते हुये सफाई

कामगार के हाथ ।वाशरूम में स्तेमाल होते खतरनाक रसायन 

उससे कमजोर होते फेफड़े और हाथों में पड़ते जलन व छाले

चंद पैसों की खातिर आप वाशरूम साफ करवा लें इसका इंतजार।

दो वक्त की रोटी पत्नी की चूड़ी बिंदी बच्चों के सपने सर पर हो छत

इसके संग इन्हें भी है सम्मान के एक ध्वज की दरकार। 


हमारे तुम्हारे इक आदेश के यह गुलाम नहीं स्वतंत्र भारत 

में गुलामों का क्या काम । यह उनका काम है और इस काम 

के लिये क्यों ना करें हम उनका सम्मान। वह सम्मान के हकदार हैं।

इन्हें प्यार से दिदी भैया या किसी अन्य नाम से पुकारिये। इनके काम

से नहीं। क्यों कि पैसों संग सम्मान के इक ध्वज की दरकार सभी को

होती है।


रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

ramamedia15@gmail.com

 

 






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