न्यायपालिका की सख्त टिप्पणीः बेशर्मी की हद तक उ.प्र. सरकार आरोपी पुलिसकर्मियों को बचाती है

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

उत्तर प्रदेश की आम जनता तो वहां की सरकार और पुलिस से सख्त नाराज है ही, न्यायपालिका भी आए दिन अपने गुस्से का इजहार कर रही है। अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट और इलाहबाद हाई कोर्ट ने कुछ मामलों को लेकर उत्तरप्रदेश की पुलिस के विरूद्ध सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं। एक मामले में एक फौजी की थाने में एक खाट से बांधकर दो घंटे तक पिटाई की गई। पुलिस की ज्यादती से दुःखी इस फौजी ने अदालत में एक याचिका दायर की। याचिका में फौजी ने बेरहमी से पिटाई की शिकायत तो की ही उसने यह आरोप भी लगाया कि उसके प्राईवेट अंग में एक सरिया ठूंस दिया गया जिससे वह खूना खून हो गया। उसने यह शिकायत उच्चाधिकारियों से की परंतु तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी उच्चाधिकारियों द्वारा इस संबंध में कोई कार्रवाही नहीं की गई। अदालत को यह भी बताया गया कि न सिर्फ उसके साथ बल्कि महिलाओं के साथ भी बदसलूकी की गई। उसके परिवार की महिलाओं को बिना महिला पुलिस के थाने लाया  गया और परिवार के सदस्यों की उपस्थिति में उसे नग्न करके दो घंटे तक पीटा गया। फौजी के साथ हुई ज्यादती की शिकायत दिल्ली गुरूद्वारा प्रबंधक समिति ने भी की। जब कहीं से भी न्याय नहीं मिला तो मामला हाई कोर्ट में पहुंचा। हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद दोषी पुलिसकर्मियों के विरूद्ध सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने इस अत्यधिक दुरूखद घटना पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस सरकार की सेवक तो है ही वह जनता की सेवक भी है। उसे जनता के साथ अत्यधिक सावधानी से कानून के अनुसार व्यवहार करना चाहिए। हाईकोर्ट ने शासन को आदेश दिया कि मामले की विस्तृत जांच तीन महीने में पूर्ण कर आरोपी पुलिस कर्मियों के विरूद्ध सख्त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक 19 साल पुरानी मुठभेड़ के मामले में अभी तक कार्रवाई नहीं होने पर नाराजगी प्रकट की है। कोर्ट ने एनकाउंटर में मारे गए व्यक्ति के पिता को तुरंत सात लाख रूपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि साधारणतरू ऐसे मामलों में वह सीधे याचिका स्वीकार नहीं करते हैं परंतु चूंकि यह मामला असाधारण महत्व का था इसलिए हमने (कोर्ट ने) इसे सुनना स्वीकार किया। कोर्ट ने कहा कि उत्तरप्रदेश शासन तब हरकत में आया जब पिछली एक सितंबर को हमने इस मामले में नोटिस जारी किए। उसके बाद ही घटना के पूरे 19 साल बीत जाने के बाद आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इस दरम्यान एक आरोपी सेवानिवृत्त हो गया और उसे सेवानिवृत्ति पर मिलने वाली पूरी राशि का भुगतान कर दिया गया। कोर्ट ने यह टिप्पणी भी की कि यह मामला इसका एक उदाहरण है कि राजसत्ता आरोपी पुलिसकर्मियों का बेशर्मी की हद तक बचाव करती है।