हम तुमसे पाए हैं

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

एक मित्र ने सलग्न चित्र पर लिखने का आदेश दिया जो प्रस्तुत है, श्री आलोक शुक्ला, श्री वृजेन्द्र सिंह औऱ लोकनायक जयप्रकाश नारायण ट्रस्ट लखनऊ के अध्यक्ष श्री अनिल त्रिपाठी जैसे मित्रों के अवलोकनार्थ

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तुम्हें देखकर खुशियों के जो भाव उभर आए हैं।

ईश कृपा होगी पर यह सुख हम तुमसे पाए हैं।


ललक उठी हाथों में रोटी अधरों को छूने को,

तुम्हें देखकर खुद मेड़ों ने गीत नए गाए हैं।


तुम लहराते हुए हमारे खेतों तक आई हो,

हम भी तेरे स्वागत में इठला के लहराए हैं।


हमको छोड़ो तुमको लेकर वह भी चहक रहे हैं,

कड़ी धूप के कारण जो अरसे से मुरझाए हैं।


कल का सच मालूम नहीं पर साहब यह तो सच है,

बहुत दिनों के बाद इधर सुख के बादल छाए हैं।


मत पूछो समीर का परिचय भावों के उपवन से,

ये सुलझाने को आए जो तुमने उलझाए हैं।


हम दो और हमारे दो जी तेरी इन नज़रों से,

युवा वृद्ध महिला बच्ची बच्चे भी नज़राए हैं।


हाल नहीं पूछो चौसर का हमको तो लगता है,

बादशाह को सह देने को पैदल इतराए हैं।


है इतिहास गवाह सल्तनत चूर चूर होती है,

राजमहल के अहंकार जब जन से टकराए हैं।


धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव

सम्पादक 

राष्ट्रपुरुष चन्द्रशेखर सन्सद में दो टूक

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