तुम्हारा हमारा

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

ढूंढे कहां हम मिलोगे 

कहां तुम इसी मोड़ का 

तो था वादा तुम्हारा 

यदि शब्द देते खामोशियों 

को तो ना होता बिछड़ना 

तुम्हारा हमारा तो क्या हुआ 

ख्वाबों के आशियाने

दबे पांव हुए जा रहे हैं वीराने 

मगर अब भी रखा है 

महफूज इसमेें कुछ टुकड़ा 

तुम्हारा कुछ टुकड़ा 

हमारा सितारों की बस्ती में

चांद भटका ना होता तो यूं 

रात भर कोई जगता ना होता

कहीं तो तुम्हें याद आई नहीं है

नजर की खता पर पिघलना 

हमारा बड़ी उलझनें है 

कुछ बात कर ले चलो 

आखिरी एक मुलाकात कर ले 

बड़ी बेरंग मौसम सन्नाटे भरे हैं 

तिनका तिनका है बाकी

बिखरना तुम्हारा खूबसूरत 

सा कुछ तो खत्म हो रहा है

मगर क्या तुम्हें इसका 

गम हो रहा है हम 'गम' 

पी रहे हैं ज़हर' तो नहीं है 

जरूरी है जीना तुम्हारा-हमारा।


रजनी उपाध्याय,शांति नगर

अनूपपुर मध्य प्रदेश