भग- बंधन

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

उसके लिये तो वो सब फोकट की बातें थीं।

मेरे लिये उन बातों में अर्थ की नहीं चाहत थी।

जो बंध कर भी बंध ना सके,टूट कर जुड़ ना सके। 

वह रिश्तों की नहीं कुछ और ही परिभाषा थी।

जो छ्लते गये वो कब अपने थे। अपने पनसे छूट गये।

वो आंखों से छलक गये। और बे मौसम ही लुढ़क गये। 

कुछ रूठ गये कुछ छूट गये।उनमें वैसी अब बात नहीं।

 विधि का यह विधान नहीं।रूठों- छूटों  को भान नहीं।

जन्मों के बंधन छूट गये। कस्में वादे भी टूट गये। इस जन्म से 

नाता तोड़ भगबंधन से रिश्ता जोड़ चप्पल,छतरी,बंगला- गाड़ी

कपड़ा लत्ता,लक्ष्मी प्राणों सी प्यारी उससे भी मुंह मोड़ गये । 

बहुतेरे(बहुत सारे) रूठ गये बहुतेरे धरती पर यूं ही छूट गये ।

गीता के संदेश कह रहे क्या लेकर तुम आये थे और क्या 

लेकर तुम जाओगे।खाली हाथ आये थे खाली हाथ जाओगे। 

रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

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