भोजपुरी लोक धारा का अमूल्य दस्तावेज: भोजपुरी लोक सँस्कृति और परम्परा

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

अमेरिकन दार्शनिक  हाना आरेंट ( Hannah Arendt) कहती हैं-"संस्कृति चीजों पर निर्भर करती है और यह दुनिया में दिखाई देती है।" 

अब जब यह तमाम चीजें दुनिया को दिखनी बन्द हो जाए तो समझिए कि लोक संस्कृति पर गहरा संकट है।

लोक का सामूहिक उत्पाद संस्कृति है जिसमें दर्ज हैं सदियों से अर्जित ज्ञान व अनुभव। जिसके परिधि में अनगिनत चीजें समाहित हैं लोकभाषा, लोकगाथा, लोक पर्व, लोक साहित्य और लोकाचार। अजित वडनेरकर कहते हैं कि लोककला, लोक संस्कृति , लोकाचार जैसे तमाम प्रचलित शब्दों में शामिल लोक शब्द वस्तुतः क्या है? इसकी अर्थवत्ता व्यापक है । विभिन्न समुदायों के संदर्भ में जब संस्कृति शब्द का प्रयोग होता है तो उसके साथ काल का उल्लेख महत्वपूर्ण हो जाता है। संस्कृति के साथ पुरातनता अनिवार्य तत्व नहीं है। यह प्राचीन भी हो सकती है आधुनिक भी हो सकती है। संस्कृति निरंतर परिवर्तनशील है मगर इसके साथ जब लोक शब्द जुड़ता है तो स्वतः ही परंपरा का स्मरण होता है। लोक संस्कृति में पुरातनता और परंपरा दोनों का होना ज़रूरी है।

लोकभाषा-लोकगीत-लोकगाथा-लोकपर्व, लोकाचार लोक-साहित्य आदि  लोकसंस्कृति  के परिधि में आते हैं। आज ये सभी संकट के घेरे में हैं। इसे हम लोक-संकट कह सकते है  परन्तु लोक संस्कृति को सहेजने का काम सबाल्टर्न समाज करता रहा है बेशक आज उसको कुछ लोग बढ़िया से बेच रहे हैं उसके भी कारण है कि पूरा तंत्र उनका है पर जो कल्चरल क्राइसिस है वह कम नहीं हो जाता क्योंकि उत्पादक जब चीजों का मौलिक उत्पादन बन्द कर देगा तो नयापन कहाँ से आएगा और इस स्थिति में जो नक्काल है यानि कॉपीकैट वे उसी घिसी पीटी चीजों को रेघियाते रहेंगे।

फिर भी संकट के इस दौर में भोजपुरी भाषा-संस्कृति और परम्पराएं बहुत तेजी से विश्व पटल पर दिखने लगी है जैसे कि हम देख रहे है कि साल 2016 में यूनेस्को द्वारा मॉरीशस के गीत गवाई रिवाज को "मानवता के अटोव सांस्कृतिक धरोहर के लिस्ट" (लिस्ट ऑफ दि इनटैलेजिबल कल्चरल हेरिटेज ऑफ ह्यूमनिटी) में शामिल किया गया है।  भोजपुरी भाषा-साहित्य-संस्कृति का फ़लक वैश्विक पटल पर विस्तार पाया हुआ है परिणामतः यह दुनिया में दिख रहा है। 

वर्ष 2008 में नई दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेला में कला-लेखक भुनेश्वर भास्कर की लिखित 'भोजपुरी लोक-संस्कृति और परम्पराएं' नामक पुस्तक  प्रकाशन विभाग, भारत सरकार के स्टॉल से खरीद कर लाया। रोचकपूर्ण होने के कारण एक एक कर के उसमें दर्ज 32 अध्यायों को पढ़ लिया परन्तु जब पिछले वर्ष पुनः विश्व पुस्तक मेले (2019) में गया तो एक नए रूप में निखरा है और परिणामत: 12 और नए अध्यायों को  जोड़ते हुए पुस्तक को उद्दाता प्रदान की है।

यूँ तो लोक-संस्कृति पर डॉ कृष्णदेव उपाध्याय की  लोक संस्कृति की रूपरेखा, राजेश्वरी शांडिल्य की -भोजपुरी लोक संस्कृति, श्याम परमार की भारतीय लोक साहित्य, श्री हंस कुमार तिवारी व श्री राधा वल्लभ शर्मा द्वारा रचित भोजपुरी संस्कार गीत व प्रो चन्द्रदेव यादव लिखित लोक-समाज और संस्कृति नामक पुस्तकें पढ़ने का अवसर मिला पर भास्कर की इस महत्वपूर्ण पुस्तक को पढ़ने के पर 'छतीसगढ़ी लोकगीत परिचय' में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की लिखी भूमिका की एक  अंश उधृत करना प्रांसगिक है कि - "ग्राम गीतों का समस्त महत्व उनके काव्य सौंदर्य तक ही सीमित नहीं है, इसका बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य है। एक विशाल सभ्यता का उद्घाटन जो अब तक या तो विस्मृति के समुद्र में डूबी हुई या गलत समझ ली गई है। आर्यों के आगमन के पूर्व बहुत ही समृद्ध आर्य सभ्यता भारतवर्ष में फैली हुई थी और बीसियों छोटी-मोटी सभ्यताएं इस विशाल भूभाग में फैली हुई थी। 

लोक- साहित्य संस्कृति की समग्र चेतना का दिग्दर्शन कराता है केवल कथा तथाकथित सुसंस्कृत लोगों की चेतना ही संस्कृति नहीं है समग्र मानवीय चेतना मिलकर ही एक संपूर्ण संस्कृति बनती है और यह संपूर्णता आंखों से ओझल हो जाए तो मनुष्य खंडित और वीरु हो जाता है।"

भुनेश्वर भास्कर के लिखित इस पुस्तक में भोजपुरी लोक संस्कृति के विविध पक्षों को इन बिंदुओं के अंतर्गत प्रस्तुत किया जा सकता है  जैसे – 

लोक जीवन का आराध्य जिसमें करमा-धरमा, नाग-पूजा, गंगा, शीतला माई, लोकपर्व छठ,छठी मइया, रामलीला, राहु पूजा आदि हैं। वही लोक पर्व में चउक-चंदा, पचाइठ, फगुआ, चैता, गायदाढ़ आदि सम्मिलित किये गए हैं।

वही लोक-जीवन व प्रकृति के अंतर्गत रोपनी के गीतों में नारी-त्रासदी का मार्मिक वर्णन किया है। एक नवविवाहिता के माँ-बाप नहीं रहने के कारण उसकी शादी बेमेल हो जाती है तिस पर उसका पति परदेश जाकर दूसरी शादी कर लेता है और घर में सौतन ले आता है। इस त्रासद स्थिति को भास्कर जिस संजीदगी से उल्लेखित करते हैं वह लोकरंग के चितेरा भिखारी ठाकुर के बिदेसिया व  नाटक के क्रक्स से मिलता है -

बाबा मोर रहित त निक बर खोजिते

भइया खोजले बर गदेलवा हो राम..।

सेही रे गदेलवा देखि धइली धीरजवा

कुछ दिन में उ गइल परदेसवा हो राम

बाट के बटोहिया तुहुँ मोर भइया

एही बाटे देखिह मोर गदेलवा हो राम।

सच में, रोपनी के गीत में इस गीत को सुनकर मन में एक हुक सी उठती है। विद्यानिवास मिश्र ने 'लोक काव्य का मर्म' शीर्षक लेख में लिखा था कि लोककाव्य अलंकरण नहीं है, ना फैशन है,वह भारतीय संस्कृति का मर्म स्थल है।' 

लोक-जीवन और प्रकृति के हिस्से में कोठिला, कपडों का खिलौना, पान का पत्ते के भोजपुरी समाज में महत्व, ढोल, गवई रंगमंच, रामलीला,बांस-कला, ओड़िया-डलिया को सम्मिलित किया है। भास्कर साधारण से लगने वाले चीजों का भोजपुरिया सँस्कृति में कितना योगदान है उसको उल्लेखित कर असाधारण बना देते हैं। इस बात को पंडित बलदेव उपाध्याय के शब्दों में कहते है -'लोक संस्कृति शिष्ट सँस्कृति की सहायक होती है। किसी देश के धार्मिक, विश्वासों अनुष्ठानों तथा क्रिया कलापों के पूर्ण परिचय के लिए दोनों संस्कृतियों में परस्पर सहयोग अपेक्षित रहती है।'

भोजपुरी लोक संस्कृति व परम्पराओं का विस्तार बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छतीसगढ़ तक ही सीमित नहीं है वरन भारत के हरेक महानगर और औधोगिक नगरों में विस्तार ले चुका है। यह आज वोकल या लोकल नहीं है यह अब वैश्विक (ग्लोबल) है और भुनेश्वर ने इस पुस्तक को लिख कर पूरे oratory को एक मूर्त रूप दे दिया है। अब फगुआ और चैता का महत्व देखे तो भोजपुरी की यह परम्परा भारत ही नहीं मॉरीशस से लेकर समस्त कैरिबियन देशों में बड़े चाव और उल्लास से गाया जाता है- 

सुमरो मन आदि भावनी, सुमरो मन आदि भवानी

पटना के पटन देवी के सुमरो, कलकत्ता काली माई..।

फिर ढोलक,झाल और झांझ पर गाते हैं- गोरिया करि के सिंगार आंगना में पिसेली हरदिया ... जैसी चर्चित फाग गाते हैं मज़ेदार बात यह है कि ऐसे ही फाग कैरिबियन देशों में भी गए भोजपुरी क्षेत्र के गिरिमिटिया के संताने जो आजकल वहां वे शासक प्रशासक हैं, गाते है और उल्लास मनाते हैं।

कहना ना होगा इस किताब की भूमिका में भास्कर ने स्पष्ट किया है कि हो सकता है इसमें पाठकों को अंधविश्वास दिखाई दे, पर यहां श्रद्धा और आस्था का जो भाव है वह यहां की जनता को सतत संघर्षशील एंव सहिष्णु बनाता है।

सच ही है कि लोकधारा भले ही जीवन से कितनी विलक्षण तथा अद्भुत क्यों न हो, कितनी ही अविश्वासनीय तथा मिथिकल क्यों न हो तो भी वह जाति की मानसिकता पर आधारित यथार्थ ही होती है जो मन-मानस की प्रवृतियों से शक्ति प्राप्त करती है।

छठ-पूजा, लोक-पर्व छठ, कोहबर लेखन, पिडिया लेखन, गोधन और  राहु पूजा पर इस कला लेखक ने विशेष प्रकाश डाला है विदित हो कि आज छठ  लोक आस्था का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है। राहु पूजा के अध्याय में एक जीवंत तस्वीर पेश करते हुए भास्कर ने राहु पूजा के महत्व और यह दुसाध जाति से क्यों जुड़ा है उसको भी बतलाया कि वे अपने-आपको राहु का वंशज मानते हैं। ऐसे ही मुसहरों की परम्परा में समाज के अंतिम पायदान की जाति को शबरी से जोड़ कर जिसका जूठे बेर को भगवान श्री राम ने खाया था, उन्हें सम्मान प्रदान किया है।

पंजाबी लोकधारा के चिंतक बणजारा बेदी ने लिखा है कि 'हम अब तक अपनी लोकधारा के प्रति उदासीन बने रहे है। हम इसे फोकट, काल्पनिक तथा अवैज्ञानिक मान कर चलते रहे हैं, शायद इसीलिए हमने इसकी सामग्री को ढंग से नहीं देखा।'

तभी तो कला-लेखक भास्कर ने भोजपुरी लोक मन को, भोजपुरी लोक मानस की सौंदयानुभूति, लोक-कलाओं का सौंदर्यबोध और लोक-जीवन की अनुभूतियों को इस पुस्तक में समाहित किया है। इस पुस्तक में परिधान व आभूषण, बालों का श्रृंगार, मनोरंजन के साधन, खेलों में लोक परंपरा, तीज-त्यौहार, लोक-कलाएं, वास्तुकला, मूर्तिकला, भोजन, चित्रकला, काव्य और संगीत, लोक नाटय, सामाजिक व्यवस्था, धर्म, पारिवारिक संरचना, संस्कार, आवास, आर्थिक जीवन, लोक विश्वास, जीवन मूल्य एवं राजनीति सब कुछ एक एक शीर्षक के अंतर्गत रखी गई हैं।

भोजपुरी लोक-संस्कृति और परम्पराएं पुस्तक का महत्व इस लिए भी बढ़ जाता है कि कला लेखक भुनेश्वर भस्कार ने भोजपुरी लोकचित्र शैली को एक नई पहचान देने के लिए 'कोहबर लेखन' 'पिडिया लेखन' जो भोजपुर बिहार की भित्ति चित्रकला है जो काफी प्रचलित भी है पर बिहार के मधुबनी पेंटिग के अत्यधिक प्रचार के पार्श्व में कहीं गुम हो गई है, उसे नई पहचान दिलाने का महती प्रयास किया है जिसका नतीजा है कि भास्कर ने अपने पुस्तक का कवर पेज पर एक आकर्षक कोहबर चित्र को रखा है यह उनके कमिटमेंट का परिचायक है।

भुनेश्वर भास्कर की यह पुस्तक इन उद्देश्यों के लेकर लिखी गयी है वे न केवल अपने आप में महत्वपूर्ण है वरन उनकी सार्थकता साहित्य और समाज के लिये युगपत विवेचनीय है। उन्होंने  भोजपुरी लोक-संस्कृति व परम्पराओं को बड़े सहज भाव से ह्रदयंगम कियगा। इन्होने  गम्भीर चिंतन, मनन तथा अध्ययन द्वारा विषय को सुगम और सुबोध बनाने का सफल प्रयास किया है। कला लेखक भास्कर स्वयं लोक-संस्कृति, लोक चित्रकारी और लोक गायन के अध्येता रहे हैं और अपने जीवन का बड़ा भाग इसी को समर्पित किया है अतः पहली बार भोजपुरी लोक-संस्कृति का अध्ययन सामाजिक यथार्थ की दृष्टि से किया गया है। भोजपुरी लोकधारा के क्षेत्र में यह पुस्तक अपनी एक अलग पहचान बनाएगी और एक मिल का पत्थर सिद्ध होगी।


- सन्तोष पटेल

वरिष्ठ कवि , नई दिल्ली