मंदाकिनी

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


'मंदाकिनी' कहो या 'सुर नदी'

'आकाशगंगा' भी ये कहलाती

अरबों खरबों ग्रह नक्षत्रों को

जो प्रकाशमान है कर के जाती

ऊपर तिमिर से कोई कण जो

करे प्रवेश अल्हड़ रोशनी का

बेहद लाचार और निर्धन की

टूटी झोंपड़ी के छिद्र से किसी

नींद के बीचों बीच अश्रुसिक्त

गालों पर किसी भूखे बच्चे की

सजाता है उसका मधुर ख़्वाब

जो हासिल होगी उस रोटी की

कभी घूरता है काला अंधेरा

खेत की चौड़ी पड़ी दरारों से

करता है चौकीदारी रात भर

आवाज़ का पहरा झींगुरों की

दस्तक देता एक प्रकाश पुंज

उस घर में जहाँ पर खड़काता

एक वृद्ध चूहा खाली बर्तन को

खोज में कुछ दाने अनाज की

कहीं कसी घर मे घुसा चोर

जलाता मायूस और थक हारके

खोंसी गई बीड़ी कान के पीछे

उस पे क्यों न पड़ती ये रोशनी

जबकि टकराती है वह किन्हीं

सुनसान हरी भूरी झाड़ियों पर

अजगर आमादा अंधकार का

लीलने को ज़रा दिखे तो रोशनी

काश न अकारथ चला जाए

ये प्रकाश जो है ईश्वर प्रदत्त

करे आलोकित उनका जीवन

जो भी सन्तति उस भगवन की


नीलोफ़र नीरू 

देहरादून, उत्तराखंड

9411110770