अंगारा

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

धधकते हुए अंगारों में से

गिरा मैं एक अंगारा हूं

मिल सकी मुझे न हवा

राख छा गई कुछ इस तरह

कि लिपटा हुआ राख में

मैं कुछ इस तरह जी रहा हूं

इच्छाएं घुट रही है मेरे अंदर

आंधी का इंतजार कर रहा हूं

बस एक बार आ जाए तो

मेरी जिंदगी ही संवर जाए

राख मेरी हवा में उड़ जाए

मैं जलकर कुछ चमक जाऊं

कुछ न सही तो कम से कम

दुनिया को रोशनी दूं दो पल

फिर चाहे बरसात आ जाना

मेरी राख मिट्टी में मिला देना

उस मिट्टी में जो अनमोल है

जय हिन्द जिस पर बोल है

पूनम पाठक बदायूँ