चलता हूँ मुश्ताक़ आऊँगा हाँ दोपहर को मैं,,,,,,

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

है दिल बेक़रार के उनसे 

हो जाए गुफ़्तगू,

कैसे मिलाऊं नज़र को 

उनकी नज़र से मैं,

बिजली गिराने के लिए 

वो निकले हैं आज,

ख़ुदको बचाऊं या के 

अपने जिगर को मैं,

पता नहीं जिसका उसे

ही मैं ढूंढता फिरूँ,

समझ कुछ नहीं आता 

जाऊँ किधर को मैं,

मैं भी हूँ जल्दी में तुम्हें भी 

फुर्सत ज़रा नहीं,

चलता हूँ मुश्ताक़ आऊँगा

हाँ दोपहर को मैं,


डॉ, मुश्ताक अहमद शाह 

सहज़ हरदा मध्यप्रदेश