भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में साधु -संतों और फकीरों का योगदान

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

1757 से अंग्रेजी राज द्वारा जारी लूट तथा भारतीय किसानों, मजदूरों, कारीगरों की बर्बादी, धार्मिक, सामाजिक भेदभाव ने जिस गति से जोर पकड़ा उसी गति से देश के विभिन्न हिस्सों में विद्रोह की चिंगारियां भी फूटने लगीं, जो 1857 में जंग-ए-आजादी के महासंग्राम के रूप में फूट पड़ी। 1757 के बाद शुरू हुआ संन्यासी विद्रोह (1763-1800), मिदनापुर विद्रोह (1766-1767), रगंपुर व जोरहट विद्रोह (1769-1799), चिटगाँव का चकमा आदिवासी विद्रोह (1776-1789), पहाड़िया सिरदार विद्रोह (1778), रंगपुर किसान विद्रोह (1783), रेशम कारिगर विद्रोह (1770-1800), वीरभूमि विद्रोह (1788-1789), मिदनापुर आदिवासी विद्रोह (1799), विजयानगरम विद्रोह (1794), केरल में कोट्टायम विद्रोह (1787-1800), त्रावणकोर का बेलूथम्बी विद्रोह (1808-1809), वैल्लोर सिपाही विद्रोह (1806), कारीगरों का विद्रोह (1795-1805), सिलहट विद्रोह (1787-1799), खासी विद्रोह (1788), भिवानी विद्रोह (1789), पलामू विद्रोह (1800-02), बुंदेलखंड में मुखियाओं का विद्रोह (1808-12), कटक पुरी विद्रोह (1817-18), खानदेश, धार व मालवा भील विद्रोह (1817-31,1846 व 1852), छोटा नागपुर, पलामू चाईबासा कोल विद्रोह (1820-37), बंगाल आर्मी बैरकपुर में पलाटून विद्रोह (1824), गूजर विद्रोह (1824), भिवानी हिसार व रोहतक विद्रोह (1824-26), कालपी विद्रोह (1824), वहाबी आंदोलन (1830-61), 24 परगना में टीटू मीर आंदोलन (1831), मैसूर में किसान विद्रोह (1830-31), विशाखापट्टनम का किसान विद्रोह (1830-33), मुंडा विद्रोह (1834), कोल विद्रोह (1831-32) संबलपुर का गौंड विद्रोह (1833), सूरत का नमक आंदोलन (1844), नागपुर विद्रोह (1848), नगा आंदोलन (1849-78), हजारा में सय्यद का विद्रोह (1853), गुजरात का भील विद्रोह (1809-28), संथाल विद्रोह (1855-56), तक सिलसिला जारी रहा। जिसके बीच में हैदर अली, टीपू सुल्तान व नाना फर्णनविस के भारत की आजादी के लिये संगठित प्रतिरोध ने अंग्रेजों के लिये भारी मुश्किलें पैदा कर दीं।

बंगाल में सन्यासियों और फकीरों के अलग-अलग संगठन थे। पहले तो इन दोनों संगठनों ने मिलकर अंग्रेजों के साथ संघर्ष किया; लेकिन बाद में उन्होंने पृथक्-पृथक् रूप से विरोध किया। संन्यासियों में उल्लेखनीय नाम हैं—मोहन गिरि और भवानी पाठक तथा फकीरों के नेता के रूप में मजनूशाह का नाम प्रसिद्ध है। ये लोग पचास-पचास हजार सैनिकों के साथ अंग्रेजी सेना पर आक्रमण करते थे। अंग्रेजों की कई कोठियाँ इन लोगों ने छीन लीं और कई अंग्रेज अफसरों को मौत के घाट उतार दिया। अंततोगत्वा संन्यासी विद्रोह और फकीर विद्रोह—दोनों ही दबा दिए गए।

अठारहवीँ सदी के अंतिम वर्षों 1770-1820ई में अंग्रेजी शासन के विरुद्ध तत्कालीन भारत के कुछ भागों में संन्यासियों (केना सरकार , द्विजनारायन) ने उग्र आन्दोलन किये थे जिसे इतिहास में संन्यासी विद्रोह कहा जाता है। यह आन्दोलन अधिकांशतः उस समय ब्रिटिश भारत के बंगाल और बिहार प्रान्त में हुआ था। 18 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी के पत्र व्यवहार में कई बार फकीरों और संन्यासियों के छापे का जिक्र हुआ है। यह छापा उत्तरी बंगाल में पड़ते थे। 1770 ईस्वी में पड़े बंगाल में भीषण अकाल के कारण हिंदू और मुस्लिम यहां वहां घूम कर अमीरों तथा सरकारी अधिकारियों के घरों एवं अन्न भंडार को लूट लिया करते थे। ये संन्यासी धार्मिक भिक्षुक थे पर मूलतः वह किसान थे, जिसकी जमीन छीन ली गई थी। किसानों की बढ़ती दिक्कतें, बढ़ती भू राजस्व, 1770 ईस्वी में पड़े अकाल के कारण छोटे-छोटे जमींदार, कर्मचारी, सेवानिवृत्त सैनिक और गांव के गरीब लोग इन संन्यासी दल में शामिल हो गए। यह बंगाल और बिहार में पांच से सात हजार लोगों का दल बनाकर घूमा करते थे और आक्रमण के लिए गोरिल्ला तकनीक अपनाते थे। आरंभ में यह लोग अमीर व्यक्तियों के अन्न भंडार को लूटा करते थे। बाद में सरकारी पदाधिकारियों को लूटने लगे और सरकारी खजाने को भी लूटा करते थे। कभी-कभी ये लुटे हुए पैसे को गरीबों में बांट देते थे। समकालीन सरकारी रिकॉर्ड में इस विद्रोह का उल्लेख इस प्रकार है:- "सन्यासी के नाम से जाने जाने वाले डकैतो का एक दल है जो इन इलाकों में अव्यवस्था फैलाए हुए हैं और तीर्थ यात्रियों के रूप में बंगाल के कुछ हिस्सों में भिक्षा और लूटपाट मचाने का काम करते हैं क्योंकि यह उन लोगों के लिए आसान काम है। अकाल के बाद इनकी संख्या में अपार वृद्धि हुई। भूखे किसान इनके दल में शामिल हो गए, जिनके पास खेती करने के लिए न ही बीज था और न ही साधन। 1772 की ठंड में बंगाल के निचले भूमि की खेती पर इन लोगों ने काफी लूटपाट मचाई थी। 50 से लेकर 1000 तक का दल बनाकर इन लोगों ने लूटने, खसोटने और जलाने का काम किया। संन्यासी विद्रोह बंकिम चंद्र के उपन्यास "आनंदमठ" का मूल आधार है। यहाँ तक कि संन्यासी विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ “वन्दहूँ माता भवानी” का जो नारा लगाया जाता था, वही आगे चलकर बंकिमचंद्र के “वन्देमातरम” का प्रेरणास्रोत बना। इस ब्राह्मण योद्धा महाराज को इतिहास की पुस्तकों से योजनाबद्ध तरीके से गायब किया गया। हालाँकि आनंद भट्टाचार्य, जैमिनी मोहन घोष. कुलदीप नारायण, जगदीश नारायण, मैनेजर पाण्डेय, भोलानाथ सिंह जैसे इतिहासकारों एवं लोक-गायकों ने महाराज फतेह बहादुर शाही की वीरता के किस्सों को अपनी रचनाओं में जीवित रखा है।

जिन शहीदों के प्रयत्नों व त्याग से हमें स्वतंत्रता मिली, उन्हें उचित सम्मान नहीं मिला। अनेकों को स्वतंत्रता के बाद भी गुमनामी का अपमानजनक जीवन जीना पड़ा। ये शब्द उन्हीं पर लागू होते हैं:

  "उनकी तुरबत पर नहीं है एक भी दीया,

  जिनके खूँ से जलते हैं ये चिरागे वतन।

  जगमगा रहे हैं मकबरे उनके,

  बेचा करते थे जो शहीदों के कफन।।"

पूर्व में चैतन्य महाप्रभु और श्रीमंत शंकर देव ने समाज को दिशा दी और लोगों को अपने लक्ष्य के प्रति केन्द्रित किया। पश्चिम में मीराबाई, एकनाथ, तुकाराम, रामदास  और नरसी मेहता, उत्तर में संत रामानन्द, कबीरदास, गोस्वामी तुलसीदास, सूरदास, गुरु नानक देव, संत रैदास ने यह बीड़ा उठाया। इसी प्रकार से दक्षिण में माधवाचार्य, निम्बार्काचार्य, वल्लभाचार्य और रामानुजाचार्य ने किया। भक्ति काल में मलिक मोहम्मद जायसी, रसखान, सूरदास, केशवदास और विद्यापति जैसी विभूतियों ने समाज को अपनी कमियाँ सुधारने के लिए प्रेरित किया। इन विभूतियों के कारण  ही स्वतंत्रता के इस संघर्ष को अखिल भारतीय रूप मिल पाया। इन महान नायकों और नायिकाओं की जीवन गाथा को आम लोगों तक पहुंचाए जाने की आवश्यकता है। इन प्रेरणास्पद गाथाओं से हमारे देश की नई पीढ़ियों को एकता और अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्प लेने की अमूल्य शिक्षा  मिलेगी।

सलिल सरोज