रेत सी फिसलती जिंदगी


युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 


ये जिंदगी भी क्या क्या रंग लाती है

कभी ख़ुशी, कभी गम दे जाती है

कभी धूप, कभी छावँ में बिठाती है

ये जिंदगी भी क्या - क्या रंग लाती है l


जब आए बचपन तो, बड़ा हंसाती है

जब आए जवानी, हवा में उड़ाती है

जब आए बुढ़ापा, तो बड़ा सताती है

ये जिंदगी भी क्या- क्या रंग लाती है l


कभी देती ख़ुशी इतनी

कि दुनियाँ भूल बुलाती है

जब आए कोई गम

याद रब्ब की दिलाती है

ये जिंदगी भी क्या - क्या रंग लाती है l


बचपन, जवानी और बुढ़ापा

खुशी - गम, धूप छावँ

सब कुछ एक जीवन में दिखाकर

हाथों से ये फिसल जाती है

फिर अपने असली घर तक ले जाती है

ये जिंदगी ही क्या- क्या रंग

दिखाती है, क्या क्या रंग दिखाती है l


करमजीत कौर, शहर - मलोट

जिला-श्री मुक्तसर साहिब,पंजाब