ग़ज़ल : उनको उनसे ही मांगू कैसे,.

ये अश्क आँखों से,

अब रोकूँ कैसे ? 

होंठ खुलते नहीं है ,

अब बोलू कैसे ? 

जिंदगी कई राह,

लिये बैठी है ।

तेरी हाँ नहीं तो ,

मैं चलदूँ कैसे ? 

इस बियाँ बा में ,कौन ,

मिलेगा अपना,

दिल तो नादान है,

बैठ के रोलू कैसे ? 

ख्वाब जो हकीकत,

से भला लगता है,

तुम ही बतलाओ ,

मैं नींद से जागूं कैसे ?

मैं तो ' मुश्ताक ' ' हूँ ,

उनका ही मगर ए लोगों , 

कोई बतलाये के उनको ,

उनसे ही माँगू कैसे ,


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

"सहज़" मध्यप्रदेश