तुम नही आये सजन

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क 

सावन का महीना आ गया है

पर तुम नही आये सजन

पेड़ पौधे फूल पत्ते राह हैं तकते

बारिश पड़े तो उनकी तपन मिटे

मेरे मन को ठंडक कैसे मिले

जब तुम नही आये सजन

ठंडी बयार चलने लगी हैं

बारिश की बूंदें भी  पड़ने लगी हैं

ज्वाला सी तपती  धरा भी हो गयी शीतल 

पर इस मन की अगन कैसे बुझे

जब तुम  ही नही आये सजन

जहां देखो छाई हरियाली सब ओर

पर मेरा मन तो  हुआ है पतझड़ 

चहुं ओर ही सूखा है तुम बिन

अबके सावन भी न भाए मुझको

जब तुम ही नही आए सजन

बादल झूमे बरखा झूमे 

छाई घटा घनघोर

पर इस मन का क्या करूँ 

जो ढूंढे तुम्हे चहुँ ओर

सावन में बादल जब बरसें 

मेरे नैना बरसें तुम बिन

किस से कहूँ पीड़ जिया की

जब तुम ही नही आये सजन


मौलिक रचना

रीटा मक्कड़