गुरु-वंदना

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क


गुरुवर तुम तो ज्ञान हो,हो सूरज का रूप।

शिष्यों को तुम दे रहे,सदा सुनहरी धूप।।


गुरुवर तुमने सीख दे,बाँटा बहुत विवेक।

तुम तो गुरुवर तेज हो,तुम हो हरदम नेक।।


गुरुवर मैं अज्ञानमय,खोया था अँधियार।

तुमने ही निज ज्ञान से,जीवन दिया सँवार।।


सत्य,न्याय जाना नहीं,ना नैतिकता-भाव।

पर अब गुरुवर है नहीं,मुझको कोय अभाव।।


तुम पर ही विश्वास है,बस तुमसे है आस।

जब तक गुरुवर साथ तुम,सब कुछ मुझको रास।।


पहले तुमको पूजना,है मेरा संकल्प।

 नहीं तुम्हारा है यहाँ, गुरुवर कोय विकल्प।।


देवों के भी देव तुम,लगते हो भगवान।

हे गुरुवर रखना सदा,तुुम मेरा सम्मान।।


 राह दिखाई जो मुझे, तब पाया मैं ईश।

यही कामना गुरुकृपा,से उन्नत हो शीश।।


तुम गुरुवर,आचार्य हो,लगते हो ज्यों संत।

तुमने ही तो है किया,हर विकार का अंत।।

 

-प्रो(डॉ) शरद नारायण खरे

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