॥ सावन की मेघा ॥

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क


धरती के आँगन में

आकाश के आँचल में

काली घटा है दिखलाई

सावन की बदरा है छाई


प्यासी नादियाँ में

सूखी ताल तलैया में

बरखा ने बुंदे बरसाई

जब काली घटा नभ पे छाई


दादुर ने ढोल बजाया है

झींगुर भी गीत सुनाया है

लहरे उठती है सागर में

जल भर जाती है गागर में


जब पूरवाई शोर मचाती है

जब मेघा नभ पे छा जाती हे

तब मोरनी छम छम नाचती है

आकाश में बहार आ जाती है


भीगे भीगे दो युवा तन

भीग जाता है प्यार में मन

फिर झूम उठती है सावन की घटा

बाहों में समां जाती है मस्त फिजां


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार