कुर्सी की माया...कोई समझ न पाया

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क  

हमारी सोसायटी में एक मैडम जी रहती हैं। कई सालों तक सोसायटी की मुखिया बनीं रही। अब उनकी इच्छा है कि उनका बेटा सोसायटी का अध्यक्ष बने। किंतु अतीत की कुछ गलतियों ने उन्हें कुर्सी से उतार फेंका। इसका उन्हें गहरा धक्का लगा। अध्यक्षीय पद से उतरते समय कुर्सी से बिछुड़ना उन्हें अखरने लगा। हर घड़ी हर समय यहाँ तक कि नींद में भी कुर्सी-कुर्सी कहती हुई बड़बड़ाती रहती हैं। यह सब देख बेटे से रहा नहीं गया। आखिरकार उसने एक दिन माँ से पूछ ही लिया कि इस कुर्सी में ऐसी क्या खास बात है जो तुम इसका नाम ले-लेकर बड़बड़ाती रहती हो।

पढ़े-लिखे बेटे के मुँह से यह सवाल सुनकर माँ का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। माँ ने कहा - कुर्सी फायदे की हो तो बैठने का मजा ही कुछ और होता है। वैसे राजनीति में लोग खड़े ही बैठने के लिए होते हैं। कुर्सी से उतर जाओ तो एक दिन भी एक युग सा और बैठ जाओ तो पाँच साल भी पाँच मिनट सा लगता है। बड़ी गजब की चीज है बेटा! लोग फालतू में शराब को बदनाम करते हैं, जो नशा कुर्सी में है वह किसी में नहीं है। बिना पिलाए मदहोश करने की ताकत है इसमें। प्यार का नशा किसी से प्यार करने तक होता है। प्यार टूट जाए तो किसी ओर में ढूँढ़ा जा सकता है। मोह का नशा उम्र के साथ बदलती रहती है। बचपन में कुछ, जवानी में कुछ और बुढ़ापे में कुछ। इसलिए प्यार और मोह जैसी बातों से स्वयं को दूर रखना चाहिए। ये मनुष्य को कमजोर बनाती हैं। धन-दौलत का नशा, सम्मान का नशा, खुद को दूसरों से ऊँचा दिखाने का जंबो पैक नशा सिर पर छा जाए तो पहले बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। भ्रष्ट बुद्धि के लिए सही पता कुर्सी तक पहुँचना होता है। कुर्सी की माया बड़ी विचित्र होती है। उस पर बैठने वाले को अपना बुरा भी अच्छा लगने लगता है। सच्चाई झूठ, सफेद काला और रात दिन सा लगने लगता है।

माँ की बातें सुन बेटे ने कहा – अब हम कुर्सी पर तो नहीं हैं। फिर क्या करें? माँ ने कहा – बेटा! कुर्सी अपने आप चलकर नहीं आती। उसके पास पहुँचना पड़ता है। पहुँचने के लिए चलना, दौड़ना या कूदने की जरूत नहीं पड़ती। दूसरों को गिराना पड़ता है। बुरा सोचना पड़ता है। कुर्सी पर बैठने वाली की गलती पर खुशियाँ मनाना पड़ता है। मुँह में राम और बगल में छुरी रखनी पड़ती है। घड़ियाली आँसू बहाना पड़ता है। बिन बुलाई बारातों में जाना पड़ता है। जमाने भर की गालियाँ देने वाले को गले लगाना पड़ता है। गधे को बाप बनाना पड़ता है। कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना लगाना पड़ता है। दुनिया तुम्हें लाख भला-बुरा कहे, खुशी-खुशी उनके सामने हाथ जोड़कर झुकना पड़ता है। घर-परिवार को छोड़ दुनिया भर को परिवार बनाना पड़ता है। कुल मिलाकर निर्माण से अधिक तोड़-फोड़ के बारे में सोचना पड़ता है। जो यह कलाएँ सीख जाता है वह कुर्सीभोगी, न सीखे तो कुर्सीरोगी रह जाता है।      

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657