महाभोज कैसे और क्यों ?

युग जागरण न्यूज़ नेटवर्क

धरती का दूसरा नाम है मृत्यु लोक यानी यहां जो भी प्राणी है सबको मृत्यु आनी है या उसे किसी न किसी रूप में नष्ट हो जाना है। सभी प्राणी अपने प्रिय के जाने का शोक मनाते हैं किन्तु मनुष्य का हर क्रिया कलाप किसी ना किसी संस्कार से जुड़ा हुआ है । मनुष्य की मृत्यु के लिए भी  एक संस्कार निर्धारित है जिसमें मुखाग्नि से लेकर महा भोज तक अनेक क्रियाएं सम्मिलित हैं।  महा भोज जोकि तेरहवीं का भोज होता है जिसमें समस्त परिवार , खानदान और जाति - बिरादरी के लोगों को बुलाकर मृत व्यक्ति के नाम का भोज करवाया जाता है । यह प्रथा शायद इस उद्देश्य से बनाई गई होगी कि सब जानने वाले , सगे - सम्बन्धी मृत व्यक्ति से अपने सम्बन्ध को याद करें , उसके विषय में दो शब्द कहें और मृतक के परिवार को संबल प्रदान करें। 

लेकिन कालांतर में इसका स्वरूप इतना बदल गया कि महा भोज गले में हड्डी की तरह अटक गया । जाने वाले की मृत्यु से दुखी परिवार अगर आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं है तो उसके लिए महा भोज को करवाना लोहे के चने चबाने जैसा ही है। जमीदारों , ठाकुरों से कर्ज़ा लेकर जात - बिरादरी को खाना खिलाना उसके लिए जीवन मरण का प्रश्न बन जाता था और फिर वह कर्ज के चक्र व्यूह में ऐसा फंसता था कि प्राण छूट जाते थे लेकिन उसकी भावी पीढ़ी भी इस से मुक्त ना हो पाती थी। मुंशी प्रेम चंद की कहानियों में हमने कई बार इस सत्य को जिया है । 

मृत्यु भोज करवाना कहां तक उचित है , यह एक विचारणीय प्रश्न है। ये निर्णय शत प्रतिशत परिवार का होना चाहिए ना कि समाज के ठेकेदारों का। ये समाज या समाज के तथाकथित ठेकेदार उस समय कहां गायब हो जाते हैं जब मृतक का इलाज करवाना  था या परिवार को संबल की आवश्यकता थी। 

पर मैं इस बात का निश्चित ही समर्थन करती हूं कि महाभोज करवाना है ,नहीं करवाना है, किसे बुलाना है क्या खिलाना है इस का निर्णय परिवार का ही होना चाहिए ना कि किसी का दबाव या धर्म की दुहाई देकर ज़बरदस्ती करवाया जाए। 

होना तो यह चाहिए कि समाज या जात - बिरादरी के लोगों को मिलकर  तेरहवीं या महाभोज के नाम पर मृतक के परिवार की आर्थिक मदद करनी चाहिए ।

और हम सब  ने अपने आस - पास अवश्य ही सुना होगा कि अब किसी की मृत्यु होने पर मित्र  या ऑफिस वाले अपनी क्षमतानुसार कुछ धन इकट्ठा करके मृतक के परिवार को देते हैं जोकि एक अच्छी पहल है। 

किसी के भी जीवन की पूरी ज़िम्मेदारी तो नहीं ली जा सकती किंतु इस प्रकार की मदद से उसे दृढ़ता तो प्रदान की ही जा सकती है क्योंकि पैसा सब कुछ तो नहीं है किंतु काफी परेशानियों को दूर करने में हमारी मदद ज़रूर करता है। 

कोई भी सुख का अवसर हो या दुख का अवसर हो , सारी बात आर्थिक मुद्दे पर आकर अटक जाती है। इसलिए अपनी क्षमतानुसार आप जो भी कर सकते हैं , उसे कीजिए ना कि दबाव में। 

एक बात और किसी के मरणोपरांत किसी के नाम पर झूठा दिखावा ना करें, जिसके लिए जो करना है उसके सामने, उसके जीवनकाल में ही करें जिससे कि वो जब इस दुनिया से विदा ले तो तो संतुष्टि के साथ ले ना कि अफसोस करते हुए । बाद में आप चाहे जो करें किसी की आत्मा देखने नहीं आती । 

इला श्री जायसवाल